ननु संख्याग्रहणे बह्वादीनामेव ग्रहणं स्यात्, प्रकरणस्याभिधाननियामकत्वसिद्धात् 'कृत्रिमाकृत्रिमयोः कृत्रिमे कार्यसम्प्रत्यय' इति न्यायात्। अस्ति च प्रकृते बह्वादीनां संख्यासंज्ञा कृतेति ज्ञानरूपं प्रकरणम्, न तु लोकप्रसिद्धैकद्व्यादीनामित्यत आह -
उभयगतिरिह भवति॥९॥
इह = शास्त्रे। 'संख्याया अतिशदन्तायाः' इति निषेधोऽस्या ज्ञापकः। न हि कृत्रिमा संख्या त्यन्ता शदन्ता वास्ति। तेन 'कर्तरि कर्मव्यतिहारे', 'कण्वमेघेभ्यः करणे', 'विप्रतिषिद्धं चानधिकरणे'त्यादौ लौकिकक्रियाद्रव्याद्यवगतिः। तत्र क्वोभयगतिः, क्वाकृत्रिमस्यैव, क्व कृत्रिमस्यैवेत्यत्र लक्ष्यानुसारि व्याख्यानमेव शरणम्। अत एवाम्रेडितशब्देन कृत्रिमस्यैव ग्रहणम्, न तु द्विस्त्रिर्घुष्टमात्रस्य। स्पष्टं चेदं संख्यासंज्ञासूत्रे भाष्ये। यत्तु संज्ञाशास्त्राणां मच्छास्त्रेऽनेन शब्देनैत एवेति नियमार्थत्वं 'कृत्रिमाकृत्रिम'न्यायबीजमिति तन्न, तेषामगृहीतशक्तिग्राहकत्वेन विधित्वे सम्भवति नियमत्वायोगात्। 'सर्वे सर्वार्थवाचका' इत्यभ्युपगमोऽपि योगिदृष्ट्या, न त्वमस्मदादिदृष्ट्या, विशिष्य सर्वशब्दार्थज्ञानस्याशक्यत्वात्। सामान्यज्ञानं तु न बोधोपयोगीत्यन्यत्र निरूपितम्॥९॥
कामाख्या
अभिधानियामकत्वेति। अत्राभिधापदेन तात्पर्यन्तेन अर्थविशेषे तात्पर्यग्राहकमित्यर्थः। एवं च संख्यादिपदे एकत्वादिनिरूपितालौकिकी बहुगणादिनिरूपिता शास्त्रीया च शक्तिरस्तीति कीदृशार्थबोधनेच्छया पाणिनिनोच्चारितमिति जिज्ञासायां शास्त्रकारेण बह्वादिनिरूपितशक्तिं बोधयित्वा कथमन्यार्थबोधनेच्छया उच्चारितं स्यादिति ज्ञानरूपप्रकरणेन बहुगणादावेव तात्पर्यनिर्णयेन तद्विषयकबोधस्यैव शास्त्रे संभवेन लौकिकार्थबोधाप्रसक्तिरित्येतत्फलितमेव। कृत्रिमेति। उभयगतिरिति। शास्त्रत्वावच्छेदेन लौकिकालौकिकोभयार्थतात्पर्यमस्तीति परिभाषया बोध्यते। त्यन्तेति। अर्थवत्त्यन्तेत्यर्थः। तेन कतीत्यत्र तत्संभवेऽपि अर्थवत्वाभावान्न दोषः। यत्त्विति।
अयं भावः – सिद्धे शब्दार्थसम्बन्धे इति भाष्येण शब्दार्थयोर्वच्यवाचकभावरूपशक्तिसम्बन्धस्यापि सिद्धत्वबोधनेन वृद्धिरादैजित्यादिसंज्ञाशास्त्राणां वैयर्थ्यापत्त्या शास्त्रे वृद्ध्यादिशब्दैरादैजादय एव बोधव्या इति नियममूलकोऽयं कृत्रिमेति न्याय इति। अगृहीतशक्तीति। शक्तेः सिद्धत्वेऽपि तद्ग्रहणस्यासिद्धत्वेन तदर्थं सूत्रस्यावश्यकतया नियामकत्वासंभवादिति भावः। ननु सर्वे सर्वार्थवाचका इत्यस्य का गतिरित्यत आह - सर्वे इति। विशे विशिष्येति। वृद्ध्यादिपदानामर्थवत्त्वेन तत्तदर्थवाचकत्वस्य ज्ञानेऽपि आदैच्त्वादिना तद्वाचकत्वज्ञानाय संज्ञासूत्राणामावश्यकत्वमिति भावः। ननु घटपदमर्थवाचकं पदत्वादित्यनुमानेन सामान्यलक्षणासहकृतेनार्थत्वावच्छिन्नसकलार्थनिरूपितशक्तिज्ञानमस्मदादीनामपि सुलभमित्यत आह - सामान्यज्ञानमिति। आत्वादिविशेषरुपेण बोधोपयोगी नेति भावः। अन्यत्रेति। मञ्जूषायामिति दिक्॥९॥
परिभाषार्थमञ्जरी
त्यन्ता शदन्ता चेति। ननु कतीति कृत्रिमा संख्याऽस्तीति त्यन्तप्रतिषेधोऽज्ञापक इति चेन्न। अर्थवतस्तिशब्दस्यग्रहणेन[1] तस्यैव व्यावर्त्यत्वात्। अत एव भाष्ये त्वदुक्तमाशङ्क्य 'अर्थवद्ग्रहणे नानर्थकस्ये'त्यर्थवतस्तिशब्द[2]ग्रहणमित्युक्तम्[3]। नन्वेतद्भाष्यमयुक्तम्। तथाहि - ज्ञापकात्पूर्वं सूत्रे संख्यापदेन कृत्रिमसंङ्ख्याग्रहणात् कृत्रिमत्यन्तस्यैव ग्रहणं प्रशक्तं नाकृत्रिमत्स्येत्युभयोरनुपस्थित्या कथमर्थवत्परिभाषोपस्थितिरिति चेन्न। अतिशदन्ताया इत्यस्य सङ्ख्याविशेषणत्वेन विशिष्टबुद्धौ विशेष्यज्ञानासंबलितविशेषणज्ञानस्य कारणतया तज्ज्ञानस्य पूर्वं सम्पाद्यत्वेन तदवस्थायां त्यन्तांशे उभयोरूपस्थित्या परिभाषाप्रवृत्तावर्थवति शब्दस्यैव ग्रहणे पश्चाद्विशिष्टज्ञानेनानुपपत्तिप्रतिसंधानेऽपि ज्ञापकत्वस्य साम्राज्यपदारूढत्वादिति धेयम्। स्पष्टश्चायमर्थः कैयटविवरणयोः। ननु अतिशदन्तग्रहणेन शास्त्रे अकृत्रिमस्यैव ग्रहणमिति विपरीतमेव कुतो न ज्ञाप्यत इति चेन्न। 'बहुगण' इति सूत्रबाधापेक्षया उक्तार्थस्यैवोचितत्वादिति ध्येयम्[4]। न बोधोपयोगीति।द्रव्यत्वप्रकारकद्रव्यविशेष्यकं सामान्यज्ञानम्, घटत्वप्रकारकघटविशेष्यकं विशेषज्ञानं प्रति न कारणमित्यर्थः। सामान्यज्ञानन्तु सामान्यबोधोपयोगि भवत्येव। एतेन सामान्यज्ञानस्य बोधानुपयोगित्वे जगत्सकलकृत्स्नादिभ्योऽपि बोधो न स्यादिति दूषणं दत्ततिलाञ्जलि[5]त्वमापादितम्॥९॥
[1]ग्रहणेन च इति के
[2]शब्दस्य ग्रहणम् इति खे गे
[3]'तस्यैव व्यावर्त्यत्वात्। अत एव भाष्ये त्वदुक्तमाशङ्क्य 'अर्थवद्ग्रहणे नानर्थकस्ये'त्यर्थवतस्तिशब्दग्रहणमित्युक्तम्' इति पाठः मिथिलापुस्तके नास्ति।
[4]'स्पष्टश्चायमर्थः कैयटविवरणयोः। ननु अतिशदन्तग्रहणेन शास्त्रे अकृत्रिमस्यैव ग्रहणमिति विपरीतमेव कुतो न ज्ञाप्यत इति चेन्न। 'बहुगण' इति सूत्रबाधापेक्षया उक्तार्थस्यैवोचितत्वादिति ध्येयम्।' इति पाठः मिथिलापुस्तके नास्ति।
[5]'जलाञ्जलि' इति के,खे,घे च पुस्तकेषु पाठः।
अब अग्रिम परिभाषा 'उभयगतिरिहभवति' के अवतरण क्रम में लिखा जा रहा है -
ननु संख्याग्रहणे बह्वादीनामेव ग्रहणं स्यात्, प्रकरणस्याभिधान-नियामकत्वसिद्धात् 'कृत्रिमाकृत्रिमयोः कृत्रिमे कार्यसम्प्रत्यय' इति न्यायात् । अस्ति च प्रकृते बह्वादीनां संख्यासंज्ञा कृतेति ज्ञानरूपं प्रकरणम् । न तु लोकप्रसिद्धैकद्व्यादीनामित्यत आह -
उभयगतिरिह भवति ॥ ९ ॥
व्याकरणशास्त्र में संख्या शब्द दो अर्थों में देखा जाता है । एक तो एक, दो, तीन' इत्यादि संख्याओं का वाचक संख्या शब्द, और दूसरा 'बहु, गुण, वतु इति' इत्यादि शब्दों का वाचक संख्या शब्द । इनमें पहला संख्या शब्द अकृत्रिम अर्थ का वाचक है और दूसरा कृत्रिम अर्थ का, क्योंकि बहु आदि शब्दों की संख्या संज्ञा पाणिनि सूत्र से की जाती है । अब यहाँ प्रश्न होता है कि 'संख्याग्रहणे ' संख्यापदघटित शास्त्र में सब जगह बहु इत्यादि शब्दों का ही ग्रहण होगा क्योंकि जो शब्द अनेक अर्थ वाले होते हैं उनका कहाँ पर क्या अर्थ लिया जाय इस बात के निर्णय के लिये 'संयोगादिकों* की उपस्थिति अनिवार्य होती है । संयोगादिकों के द्वारा जिस अर्थ में अभिधा नियन्त्रित कर दी जाती है, उसी अर्थ का वहाँ बोध होता है । प्रस्तुत स्थल में बहु इत्यादि शब्दों की संख्या संज्ञा की गयी है । अतः ज्ञानरूपी प्रकरण के द्वारा अभिधा का नियन्त्रण यहाँ बहु इत्यादि शब्दों को लिये ही होगा । इसलिये व्याकरण शास्त्र में संख्या शब्द से सब जगह 'बहु' इत्यादि कृत्रिम संख्या का ही ग्रहण होगा, क्योंकि कृत्रिम और अकृत्रिम के मध्य कृत्रिम का ही ग्रहण होता है । इस प्रकार यहाँ लोकप्रसिद्ध 'एक, दो' आदि संख्याओं का ग्रहण नहीं होगा । इस प्रकार की आशंका होने पर यह परिभाषा बनी कि 'उभयगतिरिह भवति' ।
यहाँ इह का अर्थ व्याकरण शास्त्र है । इसलिये व्याकरणशास्त्र में उभय की अर्थात् कृत्रिम और अकृत्रिम दोनों की गति ज्ञान होता है । यह उभयावगति व्याख्यान के आधार पर होती है । इसलिये कहीं पर कृत्रिम, कहीं पर अकृत्रिम और कहीं पर दोनों का ग्रहण किया जाता है ।
'संख्याया अतिशदन्ताया: कन्' इस सूत्र में 'अतिशदन्ताया:" यह जो निषेध अंश है वही इस परिभाषा का ज्ञापक है । यह सूत्र संख्या वाचक से कन् प्रत्यय करता है, किन्तु 'ति' और 'शत्' ये दोनों जिसके अन्त में हैं ऐसे संख्यावाचक से कन् प्रत्यय नहीं होता । यदि यहाँ केवल कृत्रिम संख्या का ही ग्रहण किया जाता तो उपर्युक्त निषेध की कोई आवश्यकता ही नहीं रह जाती । क्योंकि कृत्रिम संख्या में ऐसा कोई शब्द नहीं है, जिसके अन्त में सार्थक ति या शत् शब्द हो । ऐसी स्थिति में त्यन्त और शदन्त के निषेध के लिये किया गया 'अतिशदन्तायाः' यह निषेध व्यर्थ होकर इस परिभाषा को ज्ञापित करता है । इसका फल यह हुआ कि कन्विधायक उक्त सूत्र में भी उभयावगति के द्वारा 'विशति' इत्यादि त्यन्त शब्द तथा 'त्रिशत् चत्वारिंशत्' इत्यादि शदन्त शब्द से भी कन् प्रत्यय प्राप्त रहेगा । उसके निवारण के लिये 'अतिशदन्तायाः' यह निषेध सार्थक होता है । इसी बात को कह रहे हैं -
इह शास्त्रे । संख्याया अतिशदन्तायाः ५.१.२२ इति निषेधोऽस्या ज्ञापकः । न हि कृत्रिमा संख्या त्यन्ता शदन्ता वास्ति । तेन कर्तरि कर्मव्यतिहारे- १.३.१४, कण्वमेघेभ्यः करणे ३.१.१७, विप्रतिषिद्धं चानधिकरण- २.४.१३ इत्यादौ लौकिकक्रियाद्रव्याद्यवगतिः । तत्र क्वोभयगतिः क्वाकृत्रिमस्यैव क्व कृत्रिमस्यैवेत्यत्र लक्ष्यानुसारि व्याख्यानमेव शरणम् । अत एवाम्रेडितशब्देन कृत्रिमस्यैव ग्रहणं न तु द्विस्त्रिर्घुष्टमात्रस्य । स्पष्टं चेदं संख्यासंज्ञासूत्रे भाष्ये ।
इस व्याकरण शास्त्र में उभयगति होती है । 'संख्याया अतिशदन्तायाः' इस सूत्र का निषेध अंश इस बात का ज्ञापक है । क्योंकि कृत्रिम संख्या संज्ञा बहुगण आदि शब्दों की होती है । इनमें कोई शब्द ऐसा नहीं है, जिसके अन्त में सार्थक ति या शत् शब्द हो । ऐसी स्थिति में व्यन्त और शदन्त से कन् प्रत्यय के निवारण के लिये किया गया 'अतिशदन्ताया:' यह निषेध व्यर्थ होकर प्रस्तुत परिभाषा का ज्ञापक होता है । इस प्रकार इस शास्त्र में कृत्रिम और अकृत्रिम दोनों की अवगति का फल यह हुआ कि 'कर्तरि कर्मव्यतिहारे' इस सूत्र में कर्म शब्द से तथा "कण्वमेषेभ्यः करणे'* सूत्र के करण शब्द से कारकप्रकरण की कृत्रिम कर्म और करण संज्ञाएँ नहीं ली गईं, किन्तु यहाँ कर्म और करण के द्वारा अकृत्रिम लौकिक किया की प्रतीति होती है । इसी प्रकार 'विप्रतिषिद्धं चानधिकरणे' इस सूत्र में कृत्रिम अधिकरण संज्ञा नहीं ली गई, किन्तु अधिकरण शब्द से अकृत्रिम लौकिक द्रव्य की प्रतीति होती है ।
उसमें कहाँ कृत्रिम का बोध, कहाँ अकृत्रिम का बोध और कहाँ दोनों का बोध किया जाय, इसका निर्णय लक्ष्यानुसारी भाष्यादि व्याख्यान के आधार पर ही किया जाता है । इसलिये 'आम्रेडित' शब्द से 'तस्य परमाग्रेडितम्' सूत्र से की गई कृत्रिम 'आम्रेडित' संज्ञा का ही ग्रहण होता है, न कि लौकिक, दो-तीन बार किये हुए घुष्ट (उच्चारित) का ग्रहण होता है ।
इस उपर्युक्त विवेचन से यह भी सिद्ध हो चुका है कि प्रकरण आदि अभिया के नियामकों द्वारा कृत्रिम अर्थ में अभिया का नियन्त्रण करना ही 'कृत्रिमाकृत्रि मयोः कृत्रिमे कार्यसम्प्रत्यय:' इस स्याय का बीज है । इस सम्बन्ध में अन्य मत का उल्लेख करते हुए ग्रन्थकार कह रहे हैं -
यत्तु संज्ञाशास्त्राणां मच्छास्त्रेऽनेन शब्देनैत एवेति नियमार्थत्वं कृत्रिमाकृत्रिमन्याय-बीजमिति तन्न, तेषामगृहीतशक्तिग्राहकत्वेन विधित्वे सम्भवति नियमत्वायोगात् । 'सर्वे सर्वार्थवाचकाः' इत्यभ्युपगमोऽपि योगिदृष्ट्या, न त्वमस्मदादिदृष्ट्या, विशिष्य सर्वशब्दार्थज्ञानस्याशक्यत्वात् । सामान्यज्ञानं तु न बोधोपयोगीत्यत्र निरूपितम् ।। ९ ।।
जो यह कहते हैं कि संज्ञा सूत्र संकेत के ग्राहक होते हैं । किन्तु शब्द और अर्थ का शक्तिरूपी सम्बन्ध तो 'सिद्धे शब्दार्थसम्बन्धे' इस नियम से ही सिद्ध है । ऐसी स्थिति में सिद्ध का अनुवादक होने के कारण संज्ञा सूत्र व्यर्थ होकर नियम करते हैं । कि इस शास्त्र में इस शब्द से ये ही लिये जायेंगे । उदाहरण के लिये 'वृद्धिरादैच्' सूत्र नियम करेगा कि इस शास्त्र में वृद्धि शब्द से 'आ, ऐ, ओ' ये तीन वर्ण हो लिये जायेंगे । संज्ञासूत्रों का इस प्रकार का नियम हो कृत्रिमाकृत्रिम न्याय का बीज है । क्योंकि 'वृद्धिरेचि' सूत्र में कृत्रिम वृद्धिपदबोध्य 'आदैच्' लिये गये, न कि वृद्धि का अकृत्रिम अर्थ लिया गया । किन्तु यह कथन ठीक नहीं है, क्योंकि पहले से अगृहीत शक्ति का ग्राहक होने के कारण संज्ञासूत्रों की अपूर्व विधायकता यदि संभव है तो उन्हें नियमार्थक मानना उचित नहीं है । आदैच् निरूपित शक्ति वृद्धि शब्द में है, यह बात 'वृद्धिरादैच्' के पहले किसी अन्य प्रकार से ज्ञात नहीं है । इसलिए 'वृद्धिरादैच्' सूत्र अपूर्व बात का विधायक होने के कारण 'विधिनियमसम्भवे विधिरेव ज्यायान्' इस नियम से विधिशास्त्र ही कहा जायेगा, नियमशास्त्र नहीं ।
यदि कहा जाय कि 'सर्वे सर्वार्थवाचका:' इस नियम से 'वृद्धि' 'संस्था' इत्यादि संज्ञा शब्दों में आदैच् निरूपित तथा बहुगणादिनिरूपित शक्ति सिद्ध है । इसलिये संज्ञासूत्रों की व्यर्थता तथा उनके द्वारा इस शास्त्र में इस शब्द से यही अर्थ लिया जाय, यह ज्ञापन उचित ही है, तथा यही ज्ञापन 'कृत्रिमा कृत्रिम न्याय का बीज है, यह कथन भी ठीक ही है तो यह कहना उचित नहीं है । क्योंकि 'सर्वे सर्वार्थवाचकाः' यह नियम योगियों के लिये संभव है । उन्हीं को योगदृष्टि से 'शब्द और गर्म' उभयविध परा का प्रत्यक्ष होता है । हम लोगों की दृष्टि से यह बात संभव नहीं है, क्योंकि हम लोगों को न तो सारे शब्दों का ज्ञान है और न सारे अर्थों का । यदि कहा जाय कि हम लोगों को विशेषरूप से शब्द और अर्थ का ज्ञान यद्यपि नहीं है, किन्तु सामान्य रूप से तो यह विदित ही है कि सारे शब्द सारे अर्थों के वाचक होते हैं तो यह कथन भी अकिञ्चित्कर ही है, क्योंकि सामान्य ज्ञान विशेषरूप से बोध का उपयोगी नहीं हो सकता । यह बात अन्यत्र निरूपित है ।। ९ ।