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अनेकान्ता अनुबन्धा इति

 इत्संज्ञका अनुबन्धास्तेष्ववयवानवयवत्वसन्देह आह - 

अनेकान्ता अनुबन्धा इति॥४॥

अनेकान्ता अनवयवा इत्यर्थः। यो ह्यवयवः स कदाचित् तत्रोपलभ्यत एव। अयं तु न तथा, तदर्थभूते विधेये कदाप्यदर्शनात्। शित्किदित्यादौ समीपेऽवयवत्वरोपेण समासो बोध्यः। 'वुञ्छण्कठे'त्यादौ णित्त्वप्रयुक्तं कार्यं पूर्वस्यैवेत्यादि तु व्याख्यानतो निर्णेयम्।  'हलन्त्यम्' इत्यत्रान्त्यशब्दः परसमीपबोधकः॥४॥

 

कामाख्या

स्मृतिविषयकत्वे सति उपेक्षानर्हत्वरूपप्रसङ्गसंगत्याऽनेकान्तपरिभाषामवतारयितुकामोऽवतरणमाह - इत्संज्ञका इति। अनुबन्धानामित्संज्ञालोपाभ्यामपहारेण विधेये कदाप्यदर्शनात्; स्वं रूपशास्त्रेण बोध्यबोधकयोः समानानुपूर्वीकत्वनियमात् 'उदीचामाङ' इत्यादिनिर्देशाच्च। बोधकताया अनुबन्धरहिते पर्याप्तेरवगमात्। अनुबध्यन्ते परस्मिन्सम्बध्यन्तेऽनुबन्धाः। तत्र वृक्षकाक‌योः संयोगसम्बन्धवदत्रापि तथस्वीकारेऽनवयवत्वम्। वृक्षशाखयोः समवायवदत्रापि तथास्वीकारेऽवयवत्वमिति सन्देहबीजम्। एवं 'हलन्त्यमि'त्यत्राव्यवबोधकान्त्यशब्देन शित्किदित्यादौ षष्ठ्यर्थावयवे बहुव्रीहिनिर्देशेन 'आटश्चे'त्यादौ सानुबन्धाद्विभक्तिदर्शनेन च अनुबन्धविशिष्टेऽपि बोधकतायाः पर्याप्तत्वमिति च सन्देहबीजम्। तथा चानुबन्धाः बोधकावयवास्तदनवयवा वेति सन्देहः। अनुबन्धत्वस्य उच्चारणार्थकवर्णेऽपि विद्यमानत्वेनानुगतरूपेण पक्षतात्वज्ञानाय मूले इत्संज्ञका इत्युक्तम्। न च सन्देहशब्दमहिम्नैव भावाभावयोरुभयोरुल्लेखसंभवादन्यतरेणान्यतरस्याक्षेपसंभवाच्च उभयोरुपादानं व्यर्थमिति वाच्यम्। यद्धर्मिकयत्सम्बन्धावच्छिन्नयत्प्रकारकनिश्चयत्वेन साध्याभावत्वावच्छिन्नप्रकारित्व साध्यविशेष्यकत्वान्यतरावच्छिन्नं यत्संशयं प्रति निवर्तकत्वं तस्य सन्देहस्य तत्पक्षक तत्‌साध्यकानुमितावेव पक्षतात्वमिति स्वीकारेणोभयोरुपादानस्यावश्यकत्वात्। तथा चानुबन्धा बोधकानवयवा विधेये कदाप्यदर्शनादित्यनुमानप्रयोगः सिद्धः। ननु हेतुमप्रदर्श्य उपनयनादेः प्रदर्शनमयुक्तमिति चेन्न, अनुबन्धाः बोधकानवयवाः बोधकघटकत्वेनोपल‌ब्धिविषयताशून्यत्वादिति। प्रथमानुमानप्रयोगे बोध्यबोधकयोर्न्निश्चयाभावेन हेतुतावच्छेदकरूपेण हेतोरसिद्धया पर्वतो वह्निमान् वह्निमत्वादितिवदुक्तानुमानासंभवात्, अतः अनुबन्धाः बोधकघटकत्वेनोपलब्धिविषयता शून्याः तदर्थभूतेविधेये कदाप्यदर्शनादित्यनुमानान्तरप्रयोग इत्यदोषात्। नन्वेवं साध्याभाववति गुणघटकगकारे हेतोः सत्वाद्व्यभिचारः। न च स्वरूपबोधकानवयत्वस्यैव साध्यतया गुणशब्दस्य स्वरूपबोधकत्वाभावेन न व्यभिचार इति वाच्यम्, निरूपकभेदेन धर्मद्वयस्यैकत्रसमावेशदर्शनाद्विरोधाभावेन संशयाभावादनुमानस्यैवानुत्थानापत्तेरिति चेन्न। स्वघटितघटकवृत्तिश्रावणप्रत्यक्षविषयतावच्छेदकधर्मेणसाक्षादवच्छिन्नविधेयताप्रयोजकपदानवयवा इत्यर्थेनादोषात्। गकारघटितगुणघटकगकारवृत्तिश्रावणप्रत्यक्षविषयतावच्छेदकगत्वधर्मेण साक्षादवच्छिन्नविधेयताया अभावान्न व्यभिचारः। न चैवमपि अकारघटितगुणघटकाकार वृत्तिश्रावणप्रत्यक्षविषयतावच्छेदकात्वधर्मेण साक्षादवच्छिन्नविधेयताया अकारे सत्त्वेन तत्प्र योजकगुणशब्दानवयवत्वस्य गुणघटकाऽकारेऽसत्वेन हेतोश्च सत्वाद्व्यभिचार इति वाच्यम्। स्वघटितघटकयावद्वृतीत्यादिस्वीकारेणादोषात्। यावत्वस्य समुदाये गुणे पर्याप्तत्वेनाकारे तदभावान्न दोषः। न चैवं सनो नकारे नकारघटितसन्‌घटकं यावत् स्कार-अकार-न्‌कारस्तद्वृत्तिश्रावणप्रत्यक्षविषयतावच्छेदकसन्त्वधर्मेण साक्षादवच्छिन्नविधेयताया अप्रसिद्ध्या व्यभिचारः। एवमनुवादे 'सन्यत' इत्यादौ नकार‌घटित सनीतिपद‌घटकं यावत् स्-अ-न्-इ इति तद्वृत्तिश्रावणप्रत्यक्षविषयतावच्छेदक सत्व-अत्व-नत्व-इत्व-धर्मेण साक्षादवच्छिन्नविधेयताया अभावेन व्यभिचारः। एवं 'वुञ्छणि'त्यत्र ञकारघटितद्वन्द्वात्मकपदघटकयावद्वृत्तिश्रावणप्रत्यक्ष विषयतावच्छेदकधर्मेण साक्षादवच्छिन्नविधेयताया अभावेन व्यभिचार इति वाच्यम्। स्वघटितपदाघटितपद‌घटकानुबन्धेतरविभक्तीतरयावद्वृतीत्यादिस्वीकारेणादोषात्। ननु प्रत्युच्चारणं शब्दो भिद्यते चेत्सनः सकारे हेतो सत्वेन व्यभिचारः, न भिद्यते चेत्तर्हि मनिनोऽन्त्यनकारे भागासिद्ध्या पक्षतावच्छेदकावच्छेदेनानुमितौ हेतोर्व्यापकत्वस्य चापेक्षितत्वेन तदभावादनुमित्यनापत्तिरिति चेन्न स्वघटितघटकप्रयोज्य विधेयतावच्छेदकविशेष्यविशेषणशृंखलोपनिबद्धयावत्पदार्थसंकुचितधर्माभावादिति हेतोः स्वीकारेणादोषात्। मनिनोऽन्त्यनकारे विशेष्यविशेषणशृंखलोपनिबद्ध यावत्पदार्थसंकुचितधर्मो मकाराव्यवहितोत्तरत्वविशिष्टाकाराव्यवहितोत्तरत्वविशिष्टनत्व, नकाराव्यवहितपूर्वत्व विशिष्टाकाराव्यवहितपूर्वत्वविशिष्टमत्वरूपस्तद‌भावस्य सत्वेनादोषः । नन्वेवमपि कुक्मुम् घटकाद्यककारमकारे तादृशधर्मस्याभावेन तयोरन्त्ये भागासिद्धिस्तदवस्थेति चेन्न, विधेयतावच्छेदकधर्मवदनुबन्धाः स्वघटितघटकबोधकानवयवाः स्वघटितघटकबोधकावयवोत्तरत्वविशिष्टबोधकानवयवोत्तरत्वात्।1। विधेयतावच्छेदक धर्मवदनुबन्धेतरानुबन्धाः स्वघटितघटकवृत्तिश्रावणप्रत्यक्षविषयतावच्छेदकधर्मावच्छिन्नविधेयता प्रयोजकपदानवयवाः स्वघटितघटकवृत्तिश्रावणप्रत्यक्षविषयतावच्छेदकधर्माभावादित्यनुमानद्वय स्वीकारेण सर्वदोषपरिहारात्। अथवा स्वविशिष्टविधेयतावच्छेदकधर्माभावात्। वै० स्वघटितघटक वृत्तित्व स्वघटितपदपर्याप्तानुपूर्व्यवच्छिन्नत्वोभयसम्बन्धेन। साध्यस्तु पूर्वोक्त एव। एवं चोभय सम्बन्धेन स्वविशिष्ट‌विधेयताया अभावेन विधेयतावच्छेदकधर्मस्याप्यभावेन च तदभावस्य सर्वानुबन्धेषु सुलभमिति। केचित्तु पूवोक्तस्वघटितेत्यादिसाध्येन स्वाभावादिति हेतुनाऽनुमितिः कार्या, अभावीयप्रतियोगितावच्छेदकसम्बन्धस्तु स्वघटितघटकबोध्यतावच्छेदकधर्मवत्व स्वघटितघटक-बोधकावयवोत्तरत्वविशिष्टबोधकानवयवानुत्तरत्वोभयरूपः। अत्राव्यवत्वानवयवत्वे निश्चितानिश्चितस्वरूपे विवक्षिते इति न कोऽपि दोष इति प्राहुः। उपदेशेऽजिति सूत्रे उपदेशे किं अभ्र आँ अटित इति भाष्यसंगोपनाय अनेकान्तपक्षे स्वसमीपेऽनुबन्धे स्वनिरूपिताव्यवत्वारोपः इति कल्पनाया आवश्यकत्वे वुञ्छणादौ दोषवारणाय दघ्नचश्चकारेण स्वविशिष्टेऽनुबन्धे एव स्वनिरूपितावयवत्वारोपः। वै० स्वघटितपदाघटितपदघटकत्वसम्बन्धेनेति कल्पने 'घ्वसोरेद्धावभ्यासे'तिसूत्रस्थभाष्यविरोध परिहाराय स्वविशिष्टेऽनुबन्धे स्वनिरूपितावयवत्वारोपः। वै० स्वसामीप्य स्वाघटितपदाघ‌टितेऽनूबन्धेतरघटितपदाघटकत्वोभयसम्बन्धेनेति स्वीकार्य इति दिक्॥४॥

एतत्परिभाषायाः व्याख्या नोपलभ्यते।

इत्संज्ञका अनुबन्धास्तेष्ववयवानवयवत्वसन्देह आह -

जिसकी संज्ञा इत् होती है अथवा जो इत् संज्ञा के योग्य हो उसे अनुबन्ध कहते हैं । वे अवयव होते हैं या अनवयव, ऐसा सन्देह होने पर यह परिभाषा बनायी गयी -

अनेकान्ता अनुबन्धा इति ॥ ४ ॥

अनुबन्ध अनेकान्त होते हैं । अनेकान्त का अर्थ अनवयव है । अर्थात् अनुबन्ध अवयव नहीं होते ।

विमर्श - यहाँ अनुबन्धों में अनवयवत्व सिद्ध करने के लिये अनुमान की प्रक्रिया अपनायी गई है । प्रश्न होता है कि सन् का नकार सन् का अवयव है या नहीं ? अथवा स का अवयव है या नहीं ? इन प्रश्नों का उत्तर तो सुनने मात्र से ही हो जाता है । क्योंकि सन् शब्द में 'सु-अ-न्' ये तीन वर्ण हैं और स शब्द में स् और अ ये दो ही वर्ण हैं । इसलिये सन् और स के अवयवों की स्पष्ट प्रतिपत्ति होने पर तद्विषयक सन्देह ही क्यों होता है ? इस प्रश्न के उत्तर में कहा जाता है कि सन्देह केवल नकार के अवयवानवयवत्व का नहीं है, किन्तु प्रश्न यह है कि सन् में बोधकता है या स शब्द में ? देखा जाता है कि 'जुगुप्सते' इत्यादि प्रयोगों में 'स' शब्द का प्रयोग हुआ है और 'गुप्तिकिद्भ्यः सन्' इस सूत्र में सन् का प्रयोग हुआ है । ऐसी स्थिति में यदि सन् में बोधकता है तो नकार में बोधका वयवत्व होगा और यदि स में बोधकता है तो नकार में बोधकानवयवत्व होगा । इस प्रकार बोधकत्वप्रयुक्त-अवयवत्वानवयवत्व का सन्देह सुनने मात्र से निवृत्त नहीं हो सकता । अतः अनुमान की प्रक्रिया यहाँ उचित ही है । उसका यहाँ क्या प्रकार है । इस सम्बन्ध में कहते हैं।

अनेकान्ता अनवयवा इत्यर्थः । यो ह्यवयवः स कदाचित् तत्रोपलभ्यत एव । अयं तु न तथा, तदर्थभूते विधेये कदाप्यदर्शनात् ।

अनेकान्त का अर्थ अनवयव है । अर्थात् अनुबन्ध अनवयव होते हैं । क्योंकि जो जिसका अवयव होता है वह कभी न कभी उसके विधेय में अवश्य देखा जाता है । अनुबन्ध ऐसा नहीं होता क्योंकि वह तदर्थं भूतविधेय अर्थात् स्वविधेय के साथ कभी नहीं देखा जाता ।

यहाँ तत्र का अर्थ विधेय है । और तदर्थभूत में तद् शब्द का अर्थ बोधक है । उदाहरण के लिये 'जुगुप्सते' के सकार का बोधक 'गुप्तिकिद्भ्यः सन् का सन् है । इसलिये सूत्रघटक सन् का विधेय लक्ष्यस्य सकार होता है । अतः यह तदर्थभूत विधेय कहा जाता है । सन् का नकार उसके विधेय सकार के साथ कभी नहीं देखा जाता, अतः वह सन् का अवयव नहीं है ।

अब यहाँ शंका होती है कि जब सन् का नकार उसके विधेय सकार के साथ नहीं रहने के कारण सन् का अवयव नहीं है तो उसी प्रकार शप का शकार शप् के द्वारा लक्ष्य में विधेय अकार के साथ नहीं देखा जाता है, इसलिये वह भी शप् का अवयव नहीं होगा । ऐसी स्थिति में शप को शित् कैसे कहा जाय ? क्योंकि शित् का अर्थ है 'शकारः अवयवः इत् यस्यासौ शित्' अर्थात् शकाररूपी अवयव की जिसमें से इत् संज्ञा हुई हो वह, शिव कहा जाता है । यहाँ शकार तो अवयव है । नहीं, इसलिये शत्रु को शित् कहना संभव नहीं है । इसी प्रकार 'त्रसिगृधिधृषिक्षिपेः क्नुः ' सूत्र से विधेय क्नु प्रत्यय भी कितु नहीं कहा जायेगा क्योंकि ‘क्षिप्नुः' इत्यादि लक्ष्यों में विधेय नु के साथ ककार दिखायी नहीं पड़ता है । इसलिये तदयंभूत विधेय के साथ कभी न देखे जाने के कारण ककार क्नु का अनवयव है । फलस्वरूप ककार रूपी अवयव जिसका इत् संज्ञक हो वह कितु कहा जाता है, यह नियम यहां लागू न होने के कारण क्नु प्रत्यय कित् नहीं कहा जायेगा । परिणाम यह होगा कि क्षिप्नुः' में कित्वात् जो गुण का निषेध होता था वह नहीं होगा । इस प्रकार की आशंकाओं के निराकरण के लिये मूल में कहा गया है कि -

शित्किदित्यादौ समीपेऽवयवत्वरोपेण समासो बोध्यः । वुञ्छणकठ ४.२.८० इत्यादौ णित्त्वप्रयुक्तं कार्यं पूर्वस्यैवेत्यादि तु व्याख्यानतो निर्णेयम् । हलन्त्यम् १.३.३ इत्यत्रान्त्यशब्दः परसमीपबोधकः ॥ ४ ॥

शित् कित् इत्यादि शब्दों में 'शकारः, ककारः, अवयवः इत् यस्य इस प्रकार का जो समास होता है, वह आरोपित अवयवत्व के आधार पर होता है । इसका तात्पर्य यह है कि शप का शकार और क्नु का ककार जिनकी इत् संज्ञा होने वाली है वे समीप में उच्चरित अनुबन्ध हैं । इसलिये 'स्वसमीपोच्चारित अनुबन्धे स्वनिरूपितमवयवत्वमारोप्यते' इस नियम से उनमें शप और क्नु निरूपित अवयवत्व का आरोप कर दिया जाता है । इस प्रकार शित् और किंतु इत्यादि शब्दों का उक्त व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ यहाँ संगत हो जाता है । किन्तु शितु किंतु के लिये इस प्रक्रिया को अपनाने पर एक नयी समस्या यह पैदा हो जाती है कि 'वुञ्छण्कठ' इत्यादि सूत्र में छण् प्रत्यय का णकार के प्रत्यय के समीप में पठित है इसलिये उसमें कप्रत्यय निरूपित अवयवत्व का आरोप कर दिया जायेगा । इससे के प्रत्यय णि कहा जायेगा और उससे णित् प्रयुक्त कार्य होने लग जायेगा । परिणाम यह होगा कि 'ऋश्यक' इस प्रयोग में आदिवृद्धि होने लगेगी । इस शंका के उत्तर में ग्रन्थकार का कहना है कि णित्व प्रयुक्त कार्य यहाँ पूर्व को ही होगा पर को नहीं । अर्थात् 'ण' में छण् निरूपित अवयवत्व का ही आरोप होगा क निरूपित अवयवस्व का आरोप नहीं। इससे छण प्रत्यय णित् भले ही हो के प्रत्यय गित नहीं होगा । यदि कहा जाय कि 'स्वसमीपोच्चारितेऽनुबन्धे स्वनिरूपितावयवत्वमारोप्यते' इस नियम के आधार पर क के समीप होने के कारण ण को क का अवयव क्यों नहीं कहा जाय ? तो इसके उत्तर में ग्रन्थकार का कहना है कि इसका निर्णय व्याख्यान से कर लेना चाहिये । व्याख्यान के द्वारा यही सिद्ध होता है कि ण छन् का ही अवयव है न कि क प्रत्यय का। यहाँ पर व्याख्यान के लिये 'प्रमाणे द्वयसज्द दोनों घ्नमात्रचः ' इस सूत्र को लिया गया है । इस सूत्र में द्वयसच् और दघ्नच् दोनो प्रत्ययों में चकार अनुबन्ध किया गया है । प्रश्न होता है कि जब 'स्वसमीपोच्चारित अनुबन्ध में स्वनिरूपित अवयवत्व का आरोप किया जाता है तो द्वयसच् का चकार ही दघ्नच् का भी अवयव हो जाता । ऐसी स्थिति में दघ्नच में चकार अनुबन्ध की क्या आवश्यकता है ? इससे सिद्ध होता है कि अनुबन्ध में उससे पूर्व स्थित प्रत्यय का ही अवयवत्व आरोपित किया जाता है । इसलिये दध्नच् का चकार उसी का अवयव कहा जायेगा न कि मात्रच् का भी । इसलिये मात्रच् में चकार अनुबन्ध सार्थक होता है ।

अब यह शंका होती है कि 'हलन्त्यम्' सूत्र में जो अन्त्य शब्द है, उसका अर्थ है अन्त्यावयव । इसलिये यह सूत्र उपदेश में अन्त्यावयव की इत्संज्ञा करता है । उपर्युक्त व्याख्यान से यह सिद्ध हुआ है कि सन् का नकार उसका अवयव नहीं है । ऐसी स्थिति में उसकी इत्संज्ञा कैसे होगी ? यदि कहा जाय कि उसमें सन् निरूपित अवयवत्व का आरोप कर दिया जायेगा तो यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि 'शित्, कित् णित्' आदि इत्घटितधर्म के अतिदेश के लिये ही अवयवत्व का आरोप किया गया है । हलन्त्यम् सूत्र में ऐसी कोई बात नहीं है, किन्तु यहाँ तो इत् संज्ञा ही करनी है । इसलिये यहाँ अवयवत्व का आरोप संभव नहीं है । इस शका के उत्तर में ग्रन्थकार का कहना है कि 'हलन्त्यम्' में अन्त्य शब्द परसमीप का बोधक है । इसलिये उपदेश में परंसमीप की इत् संज्ञा होती है, ऐसा अर्थ करने से उपर्युक्त दोष का निराकरण हो गया ।

विमर्श - अब इस परिभाषा में प्रयुक्त अनुमान की प्रक्रिया पर भी थोड़ा विचार करना आवश्यक है । अनुबन्ध में अनेकान्तत्व (अनवयवत्व) सिद्ध करने के लिये यहाँ परार्थानुमान का आश्रयण किया गया है । इस अनुमान में पश्चावयव वाक्य का प्रयोग किया जाता है । यहाँ पर 'अनुबन्धा अनेकान्ता' यह प्रतिज्ञावाक्य है । यो 'ह्यवयवः स कदाचित् तत्रोपलभ्यत एव । यह उदाहरणवाक्य है । इसके द्वारा व्यतिरेकव्याप्ति का भी प्रदर्शन किया गया है । अन्वय व्याप्ति में साधन (हेतु) व्याप्य होता है और साध्य, व्यापक होता है, जैसेयत्र यत्र घूमस्तत्र तत्र वह्नि । व्यतिरेक व्याप्ति में साध्याभाव व्याप्य होता है और साधनाभाव व्यापक । जैसे - यत्र यत्र वधभावस्तत्र तत्र घूमाभावः । अर्थात् जहाँ जहाँ अग्नि का अभाव रहेगा वहाँ वहाँ घूम का भी अभाव रहेगा । इसी प्रकार यहाँ अनवयवत्व साध्य है और 'तदर्थंभूते विधेये कदाप्यदर्शनात्' हेतु है । इसलिये यहाँ अनवयवत्वाभाव (अवयवत्व) यह व्याप्य होगा और 'तदर्थभूते विधेये कदाप्यदर्शनात्' का अभाव 'तदर्थभूते विधेये कदाप्यदर्शनाभाव' (अर्थात् दर्शन) यह व्यापक होगा । इसलिये यहाँ व्यतिरेकव्याप्ति का प्रयोग इस प्रकार का होगा - यत्र यत्र अवयवत्वं तत्र तत्र विधेये दर्शनत्वम् ।

ग्रन्थकार ने 'यो ह्यवयवः स कदाचित् तत्रोपलभ्यत एव' इस पङ्क्ति के द्वारा इसी व्यतिरेक व्याप्ति को यहाँ सूचित किया है । इसके बाद 'अयन्तु न तथा इस उपनय वाक्य का प्रयोग किया गया है । इसके द्वारा यह बताया गया है कि अनुबन्ध अवयव की भांति विधेय में देसे नहीं जाते, इसलिये अनुमन्य अनेकान्त है । यह निगमन होता है । इस प्रकार अनुमान के द्वारा अनुबन्धों में अनवयवत्व की सिद्धि की गई है ।

यहाँ एक यह जिज्ञासा होती है कि अनुमिति में साध्यसंशय रूपी पक्षता कारण होती है । संशय का अर्थ है - एक धर्मी में परस्पर विरुद्ध दो धर्मों का मान होना 'अनेकान्ता अनुबन्धा' इस अनुमिति में अनेकान्तत्व साध्य है । अनेकान्त का अर्थ है अनवयवत्व । एतद् विषयक संशय अनुबन्ध विशेष्यक और अनवयवत्वप्रकारक तथा अनवयवत्वाभाव प्रकारक होगा, जिसे इस प्रकार कहा जा सकता है । 'अनुबन्धाः अनवयवाः अनवयवत्वाभाव वन्तो वा' । अनवयवत्व का अर्थ है अवयवत्वाभाव तथा अनवयवत्वाभाव का अर्थ है अवयवत्वाभावाभाव अर्थात् अवयवत्व । आगे दूसरी परिभाषा आती है 'एकान्ता अनुबन्धाः। एकान्त का अर्थ है अवयव इसके लिये जो संशय होगा, उसका यह स्वरूप होगाअनुबन्धा अवयवत्वाभाववन्तो वा ? । इस प्रकार स्पष्ट हो जाता है कि जो अवयवाः, अवयवत्व प्रकारक तथा अवयवत्वाभाव प्रकारक संशय अनेकान्ता अनुबन्धाः के लिये होता है वही एकान्ता अनुबन्धा के लिये भी हो रहा है । ऐसी स्थिति में ग्रन्थकार ने अनेकान्ता अनुबन्धा के अवतरण में अवयवानवयवत्वसन्देहे जो लिखा है वह ठीक नहीं है; क्योंकि अवयवविषयक अथवा अनवयवविषयक दोनों प्रकार के संशय का स्वरूप जब एक ही हो रहा है तो दोनों में से किसी एक का उपादान करने मात्र से ही दोनों परिभाषाओं के लिये पक्षता बन जाती फिर दोनों के सन्देह का उल्लेख क्यों किया गया ?

इसके उत्तर में कहा जाता है कि 'अनेकान्ता अनुबन्धा' के लिये अवयवत्वाभाव तथा अवयवत्वाभावाभाव (अवयवत्व) प्रकारक संशय तथा 'एकान्ता अनुबन्धा' के लिये अवयवत्वप्रकारक तथा अवयवत्वाभावप्रकारक संशय इन संशयों में अवयवत्वाभावप्रकारक संशय तो दोनों में यद्यपि समान ही है तथापि अवयवत्व (एकान्ता अनुबन्धा का) और अवयवत्वाभावाभावत्व (अनेकान्ता अनुबन्धा का) ये दोनों एक नहीं हैं । जिस प्रकार घट और द्रव्य दोनों के एक होने पर भी घटत्व और द्रव्यत्व भिन्न-भिन्न होते हैं उसी प्रकार अवयवत्वाभावाभाव का तात्पर्य अवयवत्व में होने पर भी अवयवत्व और अवयवत्वाभावाभाव दोनों भिन्न-भिन्न हैं । अवयवत्व जहाँ भावपदार्थ है वहाँ अवयवत्वाभावाभाव अभावपदार्थ है । इसलिये ग्रन्थकार ने दोनों परिभाषाओं के लिये अवतरण में जो 'अवयवानवयवत्वसन्देहे' लिखा है वह ठीक ही है ।

यह परिभाषा यो ह्यवयवः स कदाचित् तत्रोपलभ्यत एव इस लोकन्याय से सिद्ध है । शास्त्रीय प्रमाण के रूप में यहाँ 'नानुबन्धकृतमनेकालत्वम्' इत्यादि तीन परिभाषाओं के ज्ञापकों को प्रस्तुत किया जा सकता है । उदाहरण के लिये 'अनेकालशित् सर्वस्य' इस सूत्र में जो शिव ग्रहण किया गया है वह अनुबन्धों के एकान्त पक्ष में व्यर्थ हो जायेगा क्योंकि इस पक्ष में और स्वयं अनेकाल हो जाता और अनेकालत्वात् हो और सर्वादेश हो जाता । इसलिये अनुबन्ध अनेकान्त हैं इस बात की सम्पुष्टि होती है । इसीलिये उक्त सूत्र में शिद् ग्रहण किया गया कि अनेकाल के अभाव में शिद ग्रहण के द्वारा वहाँ सर्वादेश होवे । इस प्रकार जिन-जिन ज्ञापनों के आधार पर 'नानुबन्धकृतमनेकालत्वम्' इत्यादि तीन परिभाषाएँ ज्ञापित की जाती है उन ज्ञापकों के आधार पर अनेकान्ता अनुबन्धा इस परिभाषा को स्वीकार कर लेने पर उन तीनों परिभाषाओं की आवश्यकता समाप्त हो जाती है । यह एक प्रकार का लाघव ही है तथापि 'अनेकान्ता अनुबन्धाः' इस परिभाषा को स्वीकार करने में कुछ गौरव भी है, जिसका विवरण इस प्रकार है -

(१) शित्, कित् णित्, इत्यादि शब्दों में समास उपपन्न करने के लिये 'स्वसमीपोच्चारितेऽनुबन्धे स्वनिरूपितावयवत्वमारोप्यते' इस आरोपक वाक्य को स्वीकार करना पड़ता है ।

(२) सन् इत्यादि शब्दों में नकारादि जब अवयव ही नहीं हैं तो तदुद्घटित सनादि शब्दों से विभक्ति नहीं होनी चाहिये; अतः वहाँ सौमत्वात् विभक्ति की परिकल्पना करनी पड़ती है ।

(३) आदि शब्द की पूर्व समीप में तथा 'हलन्त्यम्' इत्यादि में अन्त्य शब्द की परसमीप में लक्षणा करनी पड़ती है ।

(४) 'आनड् ऋतो द्वन्द्वे' सूत्र से विधेय 'आन्' का नकार विधेय के साथ लक्ष्य में कभी नहीं देखा जाता । जैसे 'मातापितरों' में केवल आकार ही दिखायी पड़ता है । इस प्रकार 'आन' के नकार में 'विधेये कदाप्यदर्शनात्' यह हेतु तो गया, परन्तु बोधकानवयवाः यह साध्य उसमें नहीं गया । इस प्रकार साध्याभावाधिकरण में हेतु की सत्ता रह जाने के कारण व्यभिचारदोष भी उपस्थित हो जाता है ।