Logo SanskritVani

नानुबन्धकृतमनेजन्तत्वम्

नन्वेवमपि 'अवदातं मुखमि'त्यत्र पलोपोत्तरमात्वे कृते 'अदाप्' इति घुसंज्ञाप्रतिषेधो न स्यात्। दैपः पकारसत्त्वेऽनेजन्तत्वादात्वाप्राप्त्या पलोपोत्तरं पकाराभावेनास्य दाप्त्वाभावादत आह

नानुबन्धकृतमनेजन्तत्वम्॥७॥

'उदीचां माङः' इति निर्देशोऽस्या ज्ञापकः। 'आदेच उपदेशे' इति सूत्रेण उपदिश्यमानस्यैजन्तस्यात्त्वं क्रियते, ङकारसत्त्वे त्वेजन्तत्वाभावादात्वाप्राप्तेस्तस्यासङ्गतिः। न चास्यामवस्थायां तस्य धातुत्वाभावात्कथमात्वम्, तत्र 'धातोः' इत्यस्य निवृत्तेरित्यन्यत्र विस्तरः। स्पष्टं चेदं 'दाधा घ्वदाप्' इति सूत्रे भाष्ये॥७॥

 

कामाख्या

पलोपोत्तरमात्व इति, न च पलोपोत्तरमज्ञातस्वस्वरूपज्ञापकोच्चारणविषयत्वस्योपदिश्यमानत्वस्याभावेन कथमात्वमिति वाच्यम्। स्थानिवत्वेन तल्लाभात्। नानुबन्धेति। एवं चान्तत्व लक्षणे यस्मात्परो नास्तीत्येवं रूपे परपदेनानुबन्धेतरो ग्राह्य इत्यनया बोधनान्नदोषः। केचित्तु नानुबन्धकृतमनुपदिश्यमानत्वमित्येव वचनं कार्यम्। एवं च दैप: पकारसत्वेऽपि दैशब्दे एजन्तत्वस्य विद्यमानत्वेन परिभाषयोपदिश्यमानत्वस्य लाभान्न काप्यनुपपत्तिरिति वदन्ति। तदसत्। भाष्याननुग्रहात् विशेषफलाभावाच्च। निर्देश इति। नत्वयं माड़ो निर्देशः ज्ञापकतापरभाष्यप्रामाण्येन कर्मव्यक्तीहारे तस्यानभिधानात्। धातुत्वाभावादिति। उपदेश एवानुबन्धलोपे ततो धातुसंज्ञेति स्वीकारात्। ङकारसत्वे धातुत्वाभावादात्वाप्राप्त्या ज्ञापकासंभव इति भावः। अन्यत्र विस्तर इति। 'आदेच्' इति सूत्रे उपदेशे किं गोभ्याम् उद्देशश्च प्रातिपदिकानां नोपदेश इति भाष्योक्त्या धातोरित्यस्यासम्बन्धबोधनात् इरयोरे इत्य‌त्रैकारोच्चारणादशितीति निषेधाच्छित्परत्वयोग्यानामेवात्वविधानाच्च तद्व्यावृत्तेरित्यन्यत् स्पष्टम्॥७॥

परिभाषार्थमञ्जरी

उपदिश्यमानस्येति। उपदेशपदे कर्मणि घञिति भावः। यत्तु कैयाटानुयायिनः परिभाषाया अवतरणमाहुः। अवदातं मुखमित्यत्रोपदेशे एजन्तानामात्वमुच्यमानमित्यादि। भावघञन्तोपदेशपदोल्लेखेन भाष्यविरोधभिक्षामङ्गीचक्रुः करतले। तत्र ढौकितेत्यादावपि प्राप्नोतीति भाष्यमुपादाय [1]यदा कर्मसाधनः तदा उपदेशे इत्यस्य उपदिश्यमानस्येत्यर्थः। षष्ठ्यर्थे सप्तमी तदा तु विशेष्योपादानान्न[2] तदन्तविधौ प्रकृते न दोषः। यदा त्वन्यसाधनः तदा तदनुपादनादुपदेशे य एच् इत्यर्थे प्रकृते स्याद्दोष इति कैयटः। तत्र धातोरिति। तत्र धातोरित्यस्य निवृत्त्या ढौकितादौ दोषवारणाय तत्स्वीकार इत्यादि 'आदेच उपदेश' इति शेखरे च स्पष्टम्।

वस्तुतस्तु 'नानुबन्धकृतमनेकालत्वम्, 'नानुबन्धकृतमनेजन्तत्वमि'ति परिभाषाद्वयमपि न कर्तव्यम्। तथाहि 'आटश्चे'त्यादौ इत्संज्ञकटकारोपलक्षिताकारस्येत्यादिरर्थवत् प्रकृतेऽपि उपदेशकालोत्तरमित्संज्ञायाम् ऋकारोपलक्षिततकारो भवति, इत्संज्ञकपकारोपलक्षित तदभिन्नस्येत्यर्थान्नोपयोगः परिभाषायाः। इदं चावश्यकं दाप्शब्दोपादानेन प्रतिषेधे प्राणिदापयतीत्यादावपि निषेधप्रसङ्गः पित्प्रतिषेधे वान्तप्रतिषेधश्च न्यासभेदकः। औशादावपि भूतपूर्वशित्त्वार्थकं शकारमादाय सर्वादेशत्वसिद्ध्या शित्करणं च न कर्त्तव्यम्। माङादौ तु कृतात्वस्यानुकरणे स्वोपलक्षितत्वप्रदर्शनाय। ङकार इति तत्रापि न दोषः। एवञ्च डाशीत्यादेशविषयेऽपि आनुपूर्व्यैवसिद्धिः। सर्वादेशत्वस्य ध्वनितं चेदं 'दाधाघ्वदापि'ति सूत्रे भाष्यकैयटयोः। अत एव डादिविषये तु आनुपूर्व्येणैवादेश इति वदन् मूलकारोऽपि संगच्छते। 'नानुबन्धकृतमसारूप्यमि'ति तु कर्तव्यमेव[3]। तत्रेत्संज्ञायां प्रत्ययसंज्ञापेक्षणात्। सा च वाक्यार्थबोधोत्तरमेवेति बोध्यम्। ज्ञापकपरन्तु भाष्यमेकान्तत्वपक्षे उपदेश इत्संज्ञामङ्गीकृत्य प्रवृत्तमिति न दोषाधायकमिति दिगिति केचित्॥७॥

[1]यदा इति गे नास्ति

[2]वस्तुतस्तु ---- इत्यारभ्य दिगिति केचित् इति पर्यन्तं के खे गे ङे नास्ति।

[3]परिभाषा वक्तव्यैव इति गे

'एकान्ता अनुबन्धा' इस परिभाषा को मानने पर दूसरा दोष देते हुए लिन रहे हैं -

न चैवमप्यवदातं मुखमित्यत्र पलोपोत्तरमात्वे कृते अदाप् १.१.२० इति घुसंज्ञाप्रतिषेधो न स्यात् । दैपः पकारसत्त्वेऽनेजन्तत्वादात्वाप्राप्त्या प-लोपोत्तरं पकाराभावेनास्य दाप्त्वाभावादत आह -

इस प्रकार एकान्ता अनुबन्धाः इस परिभाषा को मानने पर यह दोष पड़ रहा है कि 'अवदातम्' इस प्रयोग में जो दे धातु से बनता है यहाँ पकार का लोप करने के बाद क्त प्रत्यय करने पर 'आदेच उपदेशे' इस सूत्र से ऐ के स्थान पर 'आ' आदेश किया जाता है, जिससे दान ऐसा रूप बनता है । यहाँ 'दाधाघ्वदाप्' सूत्रघटक 'अदापू' इस निषेध के कारण घु संज्ञा नहीं होती । इसका फल यह होता है कि अच उपसर्गात्त:' इस सूत्र से यहाँ नकार आदेश नहीं होता है किन्तु यहाँ शंका यह होती है कि 'अदा' यह निषेध यहाँ कैसे लगता है ? क्योंकि बोध्य शब्द में आत्म करने पर दा शब्द रहने पर भी पकार के न रहने के कारण "बापू" रूप नहीं मिल रहा है । जो बोधक है इसमें पकार तो है किन्तु पकार के रहते धातु एजन्त नहीं है, इसलिये आत्व न होने के कारण 'दाप्' यह रूप नहीं मिल रहा है । इस प्रकार कभी पकार के न रहने से दाप का अभाव होता है और कभी दा रूप न होने के कारण दाप का अभाव हो रहा है । ऐसी स्थिति में यहाँ अदा यह निषेध कैसे प्रवृत्त होगा? इस प्रकार की शंका होने पर ग्रन्थकार कह रहे हैं -

नानुबन्धकृत मने जन्तत्वम् ॥ ७ ॥

अनुबन्ध के कारण किसी को अनेजन्त (एजन्त भिन्न) नहीं कहा जाता । इसका फल यह हुआ कि पकार के रहने पर भी 'दप्' धातु एजन्त मान लिया गया । पकार की सत्ता उसके एजन्तत्व का विघातक नहीं हुई । इस प्रकार पकार के रहते हुए धातु को एजन्त मान कर आत्व कर दिया गया जिससे दाप रूप मिल गया और 'अदाप्' इस निषेध के कारण घु संज्ञा नहीं हुई ।

उदीचां माङः' ३.४.१९ इति निर्देशोऽस्या ज्ञापकः । आदेच उपदेशे ६.१.४५ इति सूत्रेणोपदिश्यमानस्यैजन्तस्यात्त्वं क्रियते, ङकारसत्त्वे त्वेजन्तत्वाभावादात्वाप्राप्तेस्तस्यासङ्गतिः । न चास्यामवस्थायां तस्य धातुत्वाभावात्कथमात्वम् (इति वाच्यम्), तत्र धातोः ६.१.८ इत्यस्य निवृत्तेरित्यन्यत्र विस्तरः । स्पष्टं चेदं दाधा घ्वदाप् १.१.२० इति सूत्रे भाष्ये ॥ ७ ॥

'उदीचा माङो व्यतीहारे' इस सूत्र का 'माङ: ' यह पाणिनि का निर्देश ही इस परिभाषा का ज्ञापक है । मेड् धातु से क्विप् प्रत्यय करके 'आदेच उपदेशे' सूत्र से आत्व करके माङ् शब्द का पश्चमी के एक वचन में 'माङः यह रूप को बनाया गया है । आदेश उपदेशे यह सूत्र उपदेश में एजन्त धातु के अवयव एच् आत्व करता है । किन्तु मे धातु में ङकार के रहते हुए एजन्तत्व संभव नहीं है । ऐसी स्थिति में आत्व की प्राप्ति ही नहीं है । इसलिये पाणिनि का 'माङ:' यह निर्देश असंगत हो रहा है । इस असंगति को दूर करने के लिये यह परिभाषा स्वीकृत की गई । परिभाषा स्वीकार करने का फल यह हुआ कि इकार के कारण 'मेङ्' धातु की एजन्तता में कोई बाधा नहीं हुई । ङकार के रहते हुए भी मेड् धातु एजन्त कहा गया और यहाँ आत्व हो गया ।

यदि कहा जाय कि 'आदेच उपदेशे' सूत्र से जो आत्व होता है वह धातु को होता है और धातुसंज्ञा उपदेश अवस्था में ही अनुबन्धलोप करके अनुबन्धविनिर्मुक्त की होती है । प्रस्तुत स्थल में ङकार के रहते मे की धातु संज्ञा ही नहीं होगी तो यहाँ आत्व किस प्रकार होगा ? तो इस शंका के उत्तर में कहा गया है कि 'आदेच उपदेशे' इस सूत्र में 'घातो:' इस पद की अनुवृत्ति नहीं होती है । यदि कहा जाय कि धातु की अनुवृत्ति न करने पर 'गोभ्याम्' इस प्रयोग में भी आत्व क्यों नहीं होगा तो इसका उत्तर यह कि औणादिक शब्द अव्युत्पन्न प्रातिपदिक होते हैं । इसलिये उनका उपदेश ही नहीं होता। आत्व जो होता है वह औपदेशिक एजन्त को होता है । गो शब्द में यह बात नहीं है, अतः उपर्युक्त दोष भी नहीं है । 

'उदीचां माङो व्यतीहारे' में 'माङः' यह निर्देश 'माङ् माने' धातु का नहीं है । क्योंकि ‘दाषाध्वदाप्' सूत्र के भाष्य में भाष्यकार ने 'माङ' निर्देश से ही इस परिभाषा को ज्ञापित किया है । माङ् धातु का निर्देश मानने पर भाष्यकार का ज्ञापन असंगत हो जायेगा ॥ ७ ॥